रात के दो बज चुके थे। मुंबई की गर्मी अभी भी हवा में तैर रही थी, और फ्लैट में एसी की हल्की गुनगुनाहट के अलावा सब कुछ शांत था। लेकिन रोहन के लिए ये शांति एक छलावा थी। वो अपने कमरे की सिंगल बेड पर लेटा हुआ था, आंखें छत पर टिकी हुईं, लेकिन नींद कहीं दूर भाग चुकी थी। दिन भर की ट्रेन की थकान, शहर की हलचल, और नए माहौल की वजह से उसका दिमाग वैसे भी उलझा हुआ था। ऊपर से ये अजीब आवाजें बगल के कमरे से आ रही थीं, जहां विक्रम भैया और प्रिया भाभी का बेडरूम था। शुरू में तो लगा जैसे कोई सामान्य बातचीत हो रही हो, हल्की हंसी या फुसफुसाहट। लेकिन जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ीं, वो आवाजें बदलने लगीं अब वो ज्यादा गहरी, ज्यादा तेज सांसों वाली, और कभी-कभी कोई हल्की सी कराहट जैसी। रोहन ने तकिए पर सिर घुमाया, कान दबाने की कोशिश की, लेकिन वो आवाजें दीवार के पार से उसके कानों में घुसती चली गईं। "क्या ये सपना है? या सच में कुछ हो रहा है?" उसने खुद से पूछा, दिल की धड़कनें तेज हो गईं। वो हमेशा से शरीफ और शांत लड़का रहा था कॉलेज में भी लड़के ऐसी बातें करते थे, लेकिन वो कभी शामिल नहीं होता था। आज रात पहली बार वो ऐसी दुनिया के करीब महसूस कर रहा था, जो उसके लिए अनजानी थी।
बेचैनी बढ़ती गई। वो बेड पर करवटें बदलता रहा, लेकिन आवाजें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। कभी कोई हल्की सी हंसी, कभी सांसों का तेज चलना, और बीच-बीच में बेड की चरमराहट जैसे कोई गहरा, व्यक्तिगत पल साझा हो रहा हो। रोहन का मन अजीब से विचारों से भर गया। "भैया और भाभी... क्या वो...?" वो सोच भी नहीं पा रहा था। आखिरकार, पानी पीने का बहाना बनाकर वो बेड से उठा। पैरों को धीरे से फर्श पर रखा, ताकि कोई आवाज न हो। कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर निकला। हॉल में अंधेरा था, सिर्फ किचन की तरफ से स्ट्रीट लाइट की हल्की सी रोशनी छनकर आ रही थी, जो फर्श पर लंबी परछाइयां बना रही थी। वो दीवार से सटकर चला, दिल जोरों से धड़क रहा था। आवाजें अब और साफ सुनाई दे रही थीं—प्रिया भाभी की आवाज में एक नरम सिसकारी, जैसे कोई गहरी भावना व्यक्त हो रही हो, और विक्रम भैया की गहरी, नियंत्रित सांसें। रोहन का कमरा उनके बेडरूम के ठीक बगल में था, और दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ लग रहा था शायद रात में हवा के लिए लॉक नहीं किया था। वो वहां रुक गया, दीवार से चिपककर खड़ा हो गया। सांस रोके हुए सुनने लगा।
बाहर से ही सब कुछ महसूस हो रहा था। आवाजें अब एक लय में थीं जैसे कोई संगीत, कोई गुप्त राग जो सिर्फ उन दो लोगों के बीच बज रहा हो। रोहन की हथेलियां पसीने से भीग गईं। वो जानता था कि ये गलत है, कि उसे वापस चले जाना चाहिए, लेकिन पैर जड़ हो गए थे। "बस एक सेकंड," उसने खुद से कहा, लेकिन वो सेकंड मिनटों में बदल गया। आवाजें तेज हुईं अब भाभी की सांसें और तेज, जैसे कोई गहरा आनंद महसूस कर रही हों, और भैया की आवाज में एक नियंत्रण, जैसे वो सब कुछ संभाल रहे हों। रोहन का दिमाग घूम रहा था। वो कभी ऐसी चीजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचता था कॉलेज की लाइब्रेरी, कोडिंग, क्रिकेट यही उसकी दुनिया थी। लेकिन आज रात, ये आवाजें उसके अंदर कुछ जगा रही थीं, कुछ अनजाना, कुछ जो उसे डरा भी रहा था और खींच भी रहा था।
फिर, हिम्मत जुटाकर उसने दरवाजे को धीरे-धीरे धकेला बस इतना कि एक छोटी सी दरार से अंदर झांक सके। कमरे में नाइट लैंप की हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी, जो सब कुछ धुंधला लेकिन स्पष्ट बना रही थी। बेडशीट उलझी हुई थी, और जो दृश्य उसके सामने था, उससे उसके होश उड़ गए। विक्रम भैया और प्रिया भाभी पूरी तरह से खुले थे बिना किसी बाधा के, जैसे कोई प्राचीन मूर्ति की तरह एक-दूसरे में खोए हुए। भैया नीचे लेटे हुए थे, उनका चेहरा शांत लेकिन केंद्रित, और भाभी उनके ऊपर थीं, आंखें बंद किए हुए, चेहरे पर एक मिश्रित भावना शांति, तनाव, और कुछ गहरा सुख। भैया का एक हाथ भाभी की छाती पर दबा हुआ था, जैसे कोई नाजुक लेकिन मजबूत स्पर्श दे रहा हो, और दूसरा हाथ उनके होंठों पर रखा हुआ था शायद आवाजों को दबाने के लिए, ताकि बाहर न जाएं। वो दोनों एक सामंजस्य में हिल रहे थे, जैसे कोई नृत्य, कोई गुप्त अनुष्ठान जो सिर्फ उनके बीच का था। रोहन की आंखें फैल गईं, दिल इतनी जोर से धड़का कि लगा बाहर निकल आएगा। वो फौरन साइड हो गया, दीवार से सटकर खड़ा हो गया। सांसें तेज, हाथ कांप रहे थे। "ये... ये क्या देख लिया मैंने?" उसके दिमाग में घूम रहा था। वो कभी ऐसी अंतरंगता के करीब नहीं आया था ये उसके लिए एक नई दुनिया थी, जो उसे चौंका रही थी।
लेकिन वो वहां से हिला नहीं। मिनट बीतते गए, और आवाजें जारी रहीं। रोहन की जिज्ञासा अब डर से ज्यादा हो गई थी। वो फिर से झांका इस बार ज्यादा सावधानी से। अब दृश्य थोड़ा बदल चुका था। भाभी अब थोड़ी सी मुड़ी हुई थीं, उनके बाल चेहरे पर बिखरे हुए, और भैया का हाथ अब उनकी कमर पर सरक रहा था, जैसे कोई सहारा दे रहा हो। रोशनी में भाभी की त्वचा चमक रही थी पसीने की हल्की चमक, जैसे कोई मोती। उनकी आंखें अभी भी बंद थीं, लेकिन होंठ थोड़े खुले, सांसें तेज। भैया अब थोड़े ऊपर उठे हुए थे, उनका एक हाथ भाभी की पीठ पर घूम रहा था, जैसे कोई गहरा बंधन मजबूत कर रहे हों। रोहन की सांसें रुक सी गईं। वो देखता रहा भाभी की हर हरकत, उनकी शांत अभिव्यक्ति, वो लय जो दोनों को जोड़े हुए थी। उसके अंदर कुछ उथल-पुथल मच रही थी। "भाभी इतनी... इतनी अलग लग रही हैं," वो सोच रहा था। दिन में वो इतनी साधारण, इतनी घरेलू लगती थीं मुस्कुराती हुई, चाय बनाती हुई। लेकिन अब, रात की इस रोशनी में, वो कुछ और ही थीं एक रहस्य, एक आकर्षण जो उसे खींच रहा था।
समय जैसे रुक सा गया। रोहन दीवार से सटकर खड़ा रहा, कभी झांकता, कभी आंखें बंद कर लेता। आवाजें अब और विविध हो गईं कभी हल्की फुसफुसाहट, जैसे कोई मीठी बातें, कभी तेज सांसें, जैसे कोई चरम पर पहुंच रहे हों। भैया अब स्थिति बदल चुके थे अब वो ऊपर थे, भाभी नीचे लेटी हुईं, उनके हाथ भैया की पीठ पर कसकर पकड़े हुए। रोहन ने देखा कि भाभी का चेहरा अब और शांत हो गया था, जैसे कोई गहरी संतुष्टि महसूस कर रही हों। भैया का हाथ अब उनके बालों में उलझा हुआ था, धीरे-धीरे सहला रहा था। रोहन की हथेलियां अब और पसीने से तर हो गईं। उसके अंदर एक अजीब सी उत्तेजना थी डर, अपराधबोध, और कुछ जो वो समझ नहीं पा रहा था। वो बिना सोचे अपनी पैंट थोड़ी नीचे सरकाई, और अंडरवेयर के अंदर हाथ डाल लिया। धीरे-धीरे खुद को छूने लगा, आंखें भाभी पर टिकी हुईं। वो महसूस कर रहा था जैसे वो भी उस पल का हिस्सा हो, जैसे भाभी की वो हर सांस उसके साथ जुड़ी हुई हो। मिनट बीतते गए, लेकिन उसके लिए वो घंटों जैसे लगे। आवाजें तेज हुईं, फिर धीमी, और आखिरकार शांत हो गईं जैसे कोई तूफान थम गया हो। रोहन फौरन पीछे हट गया, चुपके से अपने कमरे में लौट आया। बेड पर गिर पड़ा, सांसें अभी भी तेज। नींद तो आई नहीं, लेकिन दिमाग में वो दृश्य बार-बार घूमते रहे भाभी की वो मुस्कान, वो स्पर्श, वो शांति। वो रात भर करवटें बदलता रहा, अपराधबोध से जूझता रहा। "मैंने गलत किया... लेकिन रोक क्यों नहीं पाया?" वो खुद से पूछता रहा।
सुबह की पहली किरण कमरे में घुसी। रोहन आंखें बंद किए लेटा था, लेकिन नींद की एक झपकी भी नहीं आई थी। उसका दिमाग अभी भी रात की उन छवियों में उलझा हुआ था भाभी की वो नरम त्वचा, वो गहरी सांसें, वो अंतरंग पल। अचानक दरवाजा खुला, और प्रिया भाभी अंदर आईं ताजा नहाई हुई, सफेद साड़ी में लिपटी हुई, बालों से पानी की बूंदें टपक रही थीं। उनकी खुशबू कमरे में फैल गई जैसी कल रात की थी, वो ही जास्मिन और सैंडलवुड की मिश्रित महक। "रोहन, उठो बेटा। सुबह हो गई," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, पर्दे खोल दिए। सूरज की रोशनी कमरे में भर गई, और रोहन की आंखें खुलीं। उन्हें देखते ही कल रात के सारे दृश्य याद आ गए—वो रोशनी, वो स्पर्श, वो शांति। उसका चेहरा लाल हो गया, वो जल्दी से चादर ऊपर खींच ली। दिल की धड़कन फिर तेज हो गई, जैसे रात की वो उत्तेजना वापस लौट आई हो। "भ... भैया कहां हैं?" उसने पूछा, आवाज में हकलाहट, नजरें नीची करके।
प्रिया ने हंसते हुए कहा, "अरे, वो तो सुबह-सुबह ट्रिप पर निकल गए। बैंगलोर जाना था, एक हफ्ते बाद ही लौटेंगे। अब तू उठ, नहा ले। मैं नाश्ता बनाती हूं परांठे और चाय, तेरे पसंद के।" वो मुड़ीं और बाहर चली गईं, लेकिन जाते-जाते बालकनी की तरफ एक नजर डालीं, जैसे कुछ सोच रही हों। रोहन बेड से उठा, लेकिन दिमाग में वही यादें घूम रही थीं। वो बाथरूम में गया, शॉवर ऑन किया। गर्म पानी उसके शरीर पर गिर रहा था, लेकिन आंखें बंद करने पर सिर्फ प्रिया भाभी नजर आ रही थीं कल रात की वो छवियां, उनकी मुस्कान, उनकी छाती की वो नरमता, वो लय। पानी की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं, लेकिन वो महसूस कर रहा था जैसे भाभी की वो सांसें उसके करीब हों। "ये क्या हो रहा है मेरे साथ?" उसने खुद से पूछा, लेकिन जवाब नहीं मिला। वो ज्यादा देर तक शॉवर में खड़ा रहा, विचारों में खोया हुआ। बाहर निकलकर तैयार हुआ शर्ट और जींस पहनी, लेकिन अंदर से कुछ बदल चुका था। अब भाभी को देखने का नजरिया अलग हो गया था शरीफ रोहन के अंदर कुछ जाग चुका था, जो उसे परेशान कर रहा था। नाश्ते की मेज पर जाने से पहले उसने शीशे में खुद को देखा, बाल ठीक किए, और गहरी सांस ली। "नॉर्मल रहना पड़ेगा," उसने खुद को समझाया, लेकिन दिल मान नहीं रहा था।
(भाग 3 में जारी...)

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